श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.32

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

त्वां वर्तमानं नरदेवदेहे-

ष्वनु प्रवृत्तोऽयमधर्मपूगः।

लोभोऽनृतं चौर्यमनार्यमंहो

ज्येष्ठा च माया कलहश्‍च दम्भः॥ ३२

tvāṃ vartamānaṃ naradevadehe-

ṣvanu pravṛtto'yamadharmapūgaḥ|

lobho'nṛtaṃ cauryamanāryamaṃho

jyeṣṭhā ca māyā kalahaśca dambhaḥ|| 32

अर्थ

तेरे राजाओंके शरीरमें रहनेसे ही लोभ, झूठ, चोरी, दुष्टता, स्वधर्म-त्याग, दरिद्रता, कपट, कलह, दम्भ और दूसरे पापोंकी बढ़ती हो रही है॥ ३२॥✎ 108

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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