॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.17.31
राजोवाच
न ते गुडाकेशयशोधराणां
बद्धाञ्जलेर्वै२ भयमस्ति किञ्चित्।
न वर्तितव्यं भवता कथञ्चन
क्षेत्रे मदीये त्वमधर्मबन्धुः॥ ३१
na te guḍākeśayaśodharāṇāṃ
baddhāñjalervai bhayamasti kiñcit|
na vartitavyaṃ bhavatā kathañcana
kṣetre madīye tvamadharmabandhuḥ|| 31
अर्थ
परीक्षित् बोले—जब तू हाथ जोड़कर शरण आ गया, तब अर्जुनके यशस्वी वंशमें उत्पन्न हुए किसी भी वीरसे तुझे कोई भय नहीं है। परन्तु तू अधर्मका सहायक है, इसलिये तुझे मेरे राज्यमें बिलकुल नहीं रहना चाहिये॥ ३१॥ तेरे राजाओंके शरीरमें रहनेसे ही लोभ, झूठ, चोरी, दुष्टता, स्वधर्म-त्याग, दरिद्रता, कपट, कलह, दम्भ और दूसरे पापोंकी बढ़ती हो रही है॥ ३२॥ अतः अधर्मके साथी! इस ब्रह्मावर्तमें तू एक क्षणके लिये भी न ठहरना; क्योंकि यह धर्म और सत्यका निवासस्थान है। इस क्षेत्रमें यज्ञविधिके जाननेवाले महात्मा यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष-भगवान्की आराधना करते रहते हैं॥ ३३॥ ✎ 108
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—बद्धाञ्जलेस्ते।