॥ श्रीहरिः ॥
यस्य राष्ट्रे प्रजाः स१र्वास्त्रस्यन्ते साध्व्यसाधुभिः।
तस्य मत्तस्य नश्यन्ति कीर्तिरायुर्भगो गतिः॥ १०
yasya rāṣṭre prajāḥ sarvāstrasyante sādhvyasādhubhiḥ|
tasya mattasya naśyanti kīrtirāyurbhago gatiḥ|| 10
अर्थ
देवि! जिस राजाके राज्यमें दुष्टोंके उपद्रवसे सारी प्रजा त्रस्त रहती है उस मतवाले राजाकी कीर्ति, आयु, ऐश्वर्य और परलोक नष्ट हो जाते हैं॥ १०॥
यस्य राष्ट्रे प्रजाः सर्वास्त्रस्यन्ते साध्व्यसाधुभिः।
तस्य मत्तस्य नश्यन्ति कीर्तिरायुर्भगो गतिः॥ १०
देवि! जिस राजाके राज्यमें दुष्टोंके उपद्रवसे सारी प्रजा त्रस्त रहती है उस मतवाले राजाकी कीर्ति, आयु, ऐश्वर्य और परलोक नष्ट हो जाते हैं॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 164) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/17/10/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—मातर्हिंस्यन्ते।
(मुद्रित पृष्ठ 164)