श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.8

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

न कश्चिन्म्रियते तावद् यावदास्त इहान्तकः।

एतदर्थं हि भगवानाहूतः२ परमर्षिभिः।

अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः॥ ८

na kaścinmriyate tāvad yāvadāsta ihāntakaḥ|

etadarthaṃ hi bhagavānāhūtaḥ paramarṣibhiḥ|

aho nṛloke pīyeta harilīlāmṛtaṃ vacaḥ|| 8

अर्थ

जबतक यमराज यहाँ इस कर्ममें नियुक्त हैं, तबतक किसीकी मृत्यु नहीं होगी। मृत्युसे ग्रस्त मनुष्यलोकके जीव भी भगवान्‌की सुधातुल्य लीला-कथाका पान कर सकें, इसीलिये महर्षियोंने भगवान् यमको यहाँ बुलाया है॥ ८॥✎ 105

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—भगवानुपहूतो महर्षिभिः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 158)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #105 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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