श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.9

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

मन्दस्य मन्दप्रज्ञस्य वयो मन्दायुषश्‍च वै।

निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः॥ ९

mandasya mandaprajñasya vayo mandāyuṣaśca vai|

nidrayā hriyate naktaṃ divā ca vyarthakarmabhiḥ|| 9

अर्थ

एक तो थोड़ी आयु और दूसरे कम समझ। ऐसी अवस्थामें संसारके मन्दभाग्य विषयी पुरुषोंकी आयु व्यर्थ ही बीती जा रही है—नींदमें रात और व्यर्थके कामोंमें दिन॥ ९॥✎ 105

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #105 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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