शौनकजीने पूछा—महाभाग्यवान् सूतजी! दिग्विजयके समय महाराज परीक्षित्ने कलियुगको दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया—मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि राजाका वेष धारण करनेपर भी था तो वह अधम शूद्र ही, जिसने गायको लातसे मारा था? यदि यह प्रसंग भगवान् श्रीकृष्णकी लीलासे अथवा उनके चरणकमलोंके मकरन्द-रसका पान करनेवाले रसिक महानुभावोंसे सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिये। दूसरी व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ। उनमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है॥ ५-६॥
यह व्याख्या श्लोक 1.16.5 से 1.16.6 तककी एक साथ है।
अथवास्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम्।
किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः॥ ६
शौनकजीने पूछा—महाभाग्यवान् सूतजी! दिग्विजयके समय महाराज परीक्षित्ने कलियुगको दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया—मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि राजाका वेष धारण करनेपर भी था तो वह अधम शूद्र ही, जिसने गायको लातसे मारा था? यदि यह प्रसंग भगवान् श्रीकृष्णकी लीलासे अथवा उनके चरणकमलोंके मकरन्द-रसका पान करनेवाले रसिक महानुभावोंसे सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिये। दूसरी व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ। उनमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है॥ ५-६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.16.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 158) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/16/6/