श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.5

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

शौनक उवाच

कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः।

नृदेवचिह्नधृक् शूद्रकोऽसौ गां यः पदाहनत्।

तत्कथ्यतां महाभाग यदि कृ१ष्णकथाश्रयम्॥ ५

kasya hetornijagrāha kaliṃ digvijaye nṛpaḥ|

nṛdevacihnadhṛk śūdrako'sau gāṃ yaḥ padāhanat|

tatkathyatāṃ mahābhāga yadi kṛṣṇakathāśrayam|| 5

अर्थ

शौनकजीने पूछा—महाभाग्यवान् सूतजी! दिग्विजयके समय महाराज परीक्षित‍्ने कलियुगको दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया—मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि राजाका वेष धारण करनेपर भी था तो वह अधम शूद्र ही, जिसने गायको लातसे मारा था? यदि यह प्रसंग भगवान् श्रीकृष्णकी लीलासे अथवा उनके चरणकमलोंके मकरन्द-रसका पान करनेवाले रसिक महानुभावोंसे सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिये। दूसरी व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ। उनमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है॥ ५-६॥

यह व्याख्या श्लोक 1.16.5 से 1.16.6 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—विष्णु।

    (मुद्रित पृष्ठ 158)

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