श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.4

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

निजग्राहौजसा वीरः कलिं दिग्विजये क्‍वचित्।

नृपलिङ्गधरं शूद्रं घ्नन्तं गोमिथुनं पदा॥ ४

nijagrāhaujasā vīraḥ kaliṃ digvijaye kvacit|

nṛpaliṅgadharaṃ śūdraṃ ghnantaṃ gomithunaṃ padā|| 4

अर्थ

एक बार दिग्विजय करते समय उन्होंने देखा कि शूद्रके रूपमें कलियुग राजाका वेष धारण करके एक गाय और बैलके जोड़ेको ठोकरोंसे मार रहा है। तब उन्होंने उसे बलपूर्वक पकड़कर दण्ड दिया॥ ४॥

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