॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.15.48
अवापुर्दुरवापां ते असद्भिर्विषयात्मभिः।
विधूतकल्मषास्थानं विरजेनात्मनैव हि॥ ४८✎ 1882
avāpurduravāpāṃ te asadbhirviṣayātmabhiḥ|
vidhūtakalmaṣāsthānaṃ virajenātmanaiva hi|| 48
अर्थ
पाण्डवोंके हृदयमें भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके ध्यानसे भक्ति-भाव उमड़ आया, उनकी बुद्धि सर्वथा शुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्णके उस सर्वोत्कृष्ट स्वरूपमें अनन्यभावसे स्थिर हो गयी; जिसमें निष्पाप पुरुष ही स्थिर हो पाते हैं। फलतः उन्होंने अपने विशुद्ध अन्तःकरणसे स्वयं ही वह गति प्राप्त की, जो विषयासक्त दुष्ट मनुष्योंको कभी प्राप्त नहीं हो सकती॥ ४७-४८॥