श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.47

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तद्ध्यानोद्रिक्तया भक्‍त्या विशुद्धधिषणाः परे।

तस्मिन् नारायणपदे एकान्तमतयो२ गतिम्॥ ४७

taddhyānodriktayā bhaktyā viśuddhadhiṣaṇāḥ pare|

tasmin nārāyaṇapade ekāntamatayo gatim|| 47

अर्थ

पाण्डवोंके हृदयमें भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके ध्यानसे भक्ति-भाव उमड़ आया, उनकी बुद्धि सर्वथा शुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्णके उस सर्वोत्कृष्ट स्वरूपमें अनन्यभावसे स्थिर हो गयी; जिसमें निष्पाप पुरुष ही स्थिर हो पाते हैं। फलतः उन्होंने अपने विशुद्ध अन्तःकरणसे स्वयं ही वह गति प्राप्त की, जो विषयासक्त दुष्ट मनुष्योंको कभी प्राप्त नहीं हो सकती॥ ४७-४८॥

यह अर्थ श्लोक 47–48 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—गतयो।

    (मुद्रित पृष्ठ 157)

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