श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.36

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं

जहौ स्वतन्वा श्रवणीयसत्कथः।

तदाहरेवाप्रतिबुद्धचेतसा-

मधर्महेतुः कलिरन्ववर्तत॥ ३६

yadā mukundo bhagavānimāṃ mahīṃ

jahau svatanvā śravaṇīyasatkathaḥ|

tadāharevāpratibuddhacetasā-

madharmahetuḥ kaliranvavartata|| 36

अर्थ

भगवान्‌के स्वधामगमन और यदुवंशके संहारका वृत्तान्त सुनकर निश्‍चलमति युधिष्ठिरने स्वर्गारोहणका निश्‍चय किया॥ ३२॥ कुन्तीने भी अर्जुनके मुखसे यदुवंशियोंके नाश और भगवान्‌के स्वधामगमनकी बात सुनकर अनन्य भक्तिसे अपने हृदयको भगवान् श्रीकृष्णमें लगा दिया और सदाके लिये इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे अपना मुँह मोड़ लिया॥ ३३॥ भगवान् श्रीकृष्णने लोकदृष्टिमें जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार उतारा था, उसका वैसे ही परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटेसे काँटा निकालकर फिर दोनोंको फेंक दे। भगवान्‌की दृष्टिमें दोनों ही समान थे॥ ३४॥ जैसे वे नटके समान मत्स्यादि रूप धारण करते हैं और फिर उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार दूर किया था, उसे त्याग भी दिया॥ ३५॥ जिनकी मधुर लीलाएँ श्रवण करनेयोग्य हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णने जब अपने मनुष्यके-से शरीरसे इस पृथ्वीका परित्याग कर दिया, उसी दिन विचारहीन लोगोंको अधर्ममें फँसानेवाला कलियुग आ धमका॥ ३६॥ ✎ 103

यह व्याख्या श्लोक 1.15.32 से 1.15.36 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #103 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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