श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

युधिष्ठिरस्तत्परिसर्पणं बुधः

पुरे च राष्ट्रे च गृहे तथाऽऽत्मनि।

विभाव्य लोभानृतजिह्महिंसना-

द्यधर्मचक्रं गमनाय पर्यधात्॥ ३७

yudhiṣṭhirastatparisarpaṇaṃ budhaḥ

pure ca rāṣṭre ca gṛhe tathā''tmani|

vibhāvya lobhānṛtajihmahiṃsanā-

dyadharmacakraṃ gamanāya paryadhāt|| 37

अर्थ

महाराज युधिष्ठिरसे कलियुगका फैलना छिपा न रहा। उन्होंने देखा—देशमें, नगरमें, घरोंमें और प्राणियोंमें लोभ, असत्य, छल, हिंसा आदि अधर्मोंकी बढ़ती हो गयी है। तब उन्होंने महाप्रस्थानका निश्‍चय किया॥ ३७॥

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