॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.15.37
युधिष्ठिरस्तत्परिसर्पणं बुधः
पुरे च राष्ट्रे च गृहे तथाऽऽत्मनि।
विभाव्य लोभानृतजिह्महिंसना-
द्यधर्मचक्रं गमनाय पर्यधात्॥ ३७
yudhiṣṭhirastatparisarpaṇaṃ budhaḥ
pure ca rāṣṭre ca gṛhe tathā''tmani|
vibhāvya lobhānṛtajihmahiṃsanā-
dyadharmacakraṃ gamanāya paryadhāt|| 37
अर्थ
महाराज युधिष्ठिरसे कलियुगका फैलना छिपा न रहा। उन्होंने देखा—देशमें, नगरमें, घरोंमें और प्राणियोंमें लोभ, असत्य, छल, हिंसा आदि अधर्मोंकी बढ़ती हो गयी है। तब उन्होंने महाप्रस्थानका निश्चय किया॥ ३७॥