जैसे वे नटके समान मत्स्यादि रूप धारण करते हैं और फिर उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार दूर किया था, उसे त्याग भी दिया॥ ३५॥✎ 103
यथा मत्स्यादिरूपाणि धत्ते जह्याद् यथा नटः।
भूभारः क्षपितो येन जहौ तच्च कलेवरम्॥ ३५
जैसे वे नटके समान मत्स्यादि रूप धारण करते हैं और फिर उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार दूर किया था, उसे त्याग भी दिया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.15.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 155) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/15/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)