आपके अज्ञानकी हद हो गयी कि अब भी आप जीना चाहते हैं! परन्तु आपके चाहनेसे क्या होगा; पुराने वस्त्रकी तरह बुढ़ापेसे गला हुआ आपका शरीर आपके न चाहनेपर भी क्षीण हुआ जा रहा है॥ २४॥✎ 8990
तस्यापि तव देहोऽयं कृपणस्य जिजीविषोः।
परैत्यनिच्छतो जीर्णो जरया वाससी इव॥ २४
आपके अज्ञानकी हद हो गयी कि अब भी आप जीना चाहते हैं! परन्तु आपके चाहनेसे क्या होगा; पुराने वस्त्रकी तरह बुढ़ापेसे गला हुआ आपका शरीर आपके न चाहनेपर भी क्षीण हुआ जा रहा है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 141) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)