श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.23

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अग्‍निर्निसृष्टो दत्तश्‍च गरो दाराश्‍च दूषिताः।

हृतं क्षेत्रं धनं येषां तद्दत्तैरसुभिः कियत्॥ २३

agnirnisṛṣṭo dattaśca garo dārāśca dūṣitāḥ|

hṛtaṃ kṣetraṃ dhanaṃ yeṣāṃ taddattairasubhiḥ kiyat|| 23

अर्थ

जिनको आपने आगमें जलानेकी चेष्टा की, विष देकर मार डालना चाहा, भरी सभामें जिनकी विवाहिता पत्नीको अपमानित किया, जिनकी भूमि और धन छीन लिये, उन्हींके अन्‍नसे पले हुए प्राणोंको रखनेमें क्या गौरव है॥ २३॥✎ 89 90

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #89 शब्दोंके बीचका स्थान: कोधारणकर → को धारणकर
  • #90 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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