श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.25

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

गतस्वार्थमिमं देहं विरक्तो मुक्तबन्धनः।

अविज्ञातग१तिर्जह्यात् स वै धीर उदाहृतः॥ २५

gatasvārthamimaṃ dehaṃ virakto muktabandhanaḥ|

avijñātagatirjahyāt sa vai dhīra udāhṛtaḥ|| 25

अर्थ

अब इस शरीरसे आपका कोई स्वार्थ सधनेवाला नहीं है; इसमें फँसिये मत, इसकी ममताका बन्धन काट डालिये। जो संसारके सम्बन्धियोंसे अलग रहकर उनके अनजानमें अपने शरीरका त्याग करता है, वही धीर कहा गया है॥ २५॥✎ 89 90

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मति०।

    (मुद्रित पृष्ठ 142)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #89 शब्दोंके बीचका स्थान: कोधारणकर → को धारणकर
  • #90 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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