श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.25

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

यदा ह्यधर्मेण तमोधियो नृपा जीवन्ति तत्रैष हि सत्त्वतः१ किल।

धत्ते भगं सत्यमृतं दयां यशो भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे॥ २५

yadā hyadharmeṇa tamodhiyo nṛpā jīvanti tatraiṣa hi sattvataḥ kila|

dhatte bhagaṃ satyamṛtaṃ dayāṃ yaśo bhavāya rūpāṇi dadhadyuge yuge|| 25

अर्थ

जब तामसी बुद्धिवाले राजा अधर्मसे अपना पेट पालने लगते हैं तब ये ही सत्त्वगुणको स्वीकारकर ऐश्‍वर्य, सत्य, ऋत, दया और यश प्रकट करते और संसारके कल्याणके लिये युग-युगमें अनेकों अवतार धारण करते हैं॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सात्वतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 128)

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