॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.10.24
स वा अयं सख्यनुगीतसत्कथो वेदेषु गुह्येषु च गुह्यवादिभिः।
य एक ईशो जगदात्मलीलया सृजत्यवत्यत्ति न तत्र सज्जते॥ २४
sa vā ayaṃ sakhyanugītasatkatho vedeṣu guhyeṣu ca guhyavādibhiḥ|
ya eka īśo jagadātmalīlayā sṛjatyavatyatti na tatra sajjate|| 24
अर्थ
सखी! वास्तवमें ये वही हैं, जिनकी सुन्दर लीलाओंका गायन वेदोंमें और दूसरे गोपनीय शास्त्रोंमें व्यासादि रहस्यवादी ऋषियोंने किया है—जो एक अद्वितीय ईश्वर हैं और अपनी लीलासे जगत्की सृष्टि, पालन तथा संहार करते हैं, परन्तु उनमें आसक्त नहीं होते॥ २४॥