श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.33

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ये चापि विषयारामाः सांसारिकसुखस्पृहाः।

तेषां तु कर्ममार्गेण या सिद्धिः साधुना कलौ॥ ३३

ye cāpi viṣayārāmāḥ sāṃsārikasukhaspṛhāḥ|

teṣāṃ tu karmamārgeṇa yā siddhiḥ sādhunā kalau|| 33

अर्थ

इनके अतिरिक्त जो लोग विषयोंमें ही रमण करनेवाले हैं, सांसारिक सुखोंकी ही जिन्हें सदा चाह रहती है, उनके लिये भी अब इस कलियुगमें सामर्थ्य, धन और विधि-विधानका ज्ञान न होनेके कारण कर्ममार्ग (यज्ञादि)से मिलनेवाली सिद्धि अत्यन्त दुर्लभ हो गयी है। ऐसी दशामें उन्हें भी सब प्रकारसे अब इस भागवतकथाका ही सेवन करना चाहिये॥ ३३-३४॥✎ 1821

यह अर्थ श्लोक 33–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1821 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): विधि विधानका → विधि-विधानका

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