श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.30

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अन्यत्र त्रिगुणं चापि निर्गुणं च यथेच्छया।

यथा कथंचित् कर्तव्यं सेवनं भगवच्छ्रुतेः॥ ३०

anyatra triguṇaṃ cāpi nirguṇaṃ ca yathecchayā|

yathā kathaṃcit kartavyaṃ sevanaṃ bhagavacchruteḥ|| 30

अर्थ

भारतवर्षके अतिरिक्त अन्य स्थानोंमें भी त्रिगुण (सात्त्विक, राजस और तामस) अथवा निर्गुण-सेवन अपनी रुचिके अनुसार करना चाहिये। तात्पर्य यह कि जिस किसी प्रकार भी हो सके श्रीमद्भागवतका सेवन, उसका श्रवण करना ही चाहिये॥ ३०॥

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