॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.21
यः स्थित्वाभिमुखं प्रणम्य विधिवत्त्यक्तान्यवादो हरे-
र्लीलाः श्रोतुमभीप्सतेऽतिनिपुणो नम्रोऽथ क्लृप्तांजलिः।
शिष्यो विश्वसितोऽनुचिन्तनपरः प्रश्नेऽनुरक्तः शुचि-
र्नित्यं कृष्णजनप्रियो निगदितः श्रोता स वै वक्तृभिः॥ २१
yaḥ sthitvābhimukhaṃ praṇamya vidhivattyaktānyavādo hare-
rlīlāḥ śrotumabhīpsate'tinipuṇo namro'tha klṛptāṃjaliḥ|
śiṣyo viśvasito'nucintanaparaḥ praśne'nuraktaḥ śuci-
rnityaṃ kṛṣṇajanapriyo nigaditaḥ śrotā sa vai vaktṛbhiḥ|| 21
अर्थ
जो वक्ताके सामने उन्हें विधिवत् प्रणाम करके बैठे और अन्य संसारी बातोंको छोड़कर केवल श्रीभगवान्की लीला-कथाओंको ही सुननेकी इच्छा रखे, समझनेमें अत्यन्त कुशल हो, नम्र हो, हाथ जोड़े रहे, शिष्यभावसे उपदेश ग्रहण करे और भीतर श्रद्धा तथा विश्वास रखे; इसके सिवा, जो कुछ सुने उसका बराबर चिन्तन करता रहे, जो बात समझमें न आये, पूछे और पवित्र भावसे रहे तथा श्रीकृष्णके भक्तोंपर सदा ही प्रेम रखता हो—ऐसे ही श्रोताको वक्ता लोग उत्तम श्रोता कहते हैं॥ २१॥