श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.3.47

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तं यथामति लब्ध्वा ता आसन् विरहवर्जिताः।

नाज्ञासिषं रहस्यं तच्चमत्कारस्तु लोकितः॥ ४७

taṃ yathāmati labdhvā tā āsan virahavarjitāḥ|

nājñāsiṣaṃ rahasyaṃ taccamatkārastu lokitaḥ|| 47

अर्थ

उस सन्देशको अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण कर गोपियाँ तुरन्त ही विरहवेदनासे मुक्त हो गयीं। मैं भागवतके इस रहस्यको तो नहीं समझ सका, किन्तु मैंने उसका चमत्कार प्रत्यक्ष देखा॥ ४७॥

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