श्रीराधा और श्रीकृष्णकी सेवामें उसकी बड़ी लालसा, बड़ी लगन है; इसीलिये वह कोई दूसरा स्वरूप धारण नहीं करती। मैंने यहीं श्रीराधामें ही रुक्मिणी आदिका समावेश देखा है॥ १४॥
रूपान्तरमगृह्णाना तयोः सेवातिलालसा।
रुक्मिण्यादिसमावेशो मयात्रैव विलोकितः॥ १४
श्रीराधा और श्रीकृष्णकी सेवामें उसकी बड़ी लालसा, बड़ी लगन है; इसीलिये वह कोई दूसरा स्वरूप धारण नहीं करती। मैंने यहीं श्रीराधामें ही रुक्मिणी आदिका समावेश देखा है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.2.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 990) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/2/14/