जो लोग व्यावहारिक लीलामें स्थित हैं, वे नित्यलीलाका दर्शन पानेके अधिकारी नहीं हैं; इसलिये यहाँ आनेवालोंको सब ओर निर्जन वन—सूना-ही-सूना दिखायी देता है; क्योंकि वे वास्तविक लीलामें स्थित भक्तजनोंको देख नहीं सकते॥ ३५॥✎ 908
व्यावहारिकलीलास्थास्तत्र यन्नाधिकारिणः।
पश्यन्त्यत्रागतास्तस्मान्निर्जनत्वं समन्ततः॥ ३५
जो लोग व्यावहारिक लीलामें स्थित हैं, वे नित्यलीलाका दर्शन पानेके अधिकारी नहीं हैं; इसलिये यहाँ आनेवालोंको सब ओर निर्जन वन—सूना-ही-सूना दिखायी देता है; क्योंकि वे वास्तविक लीलामें स्थित भक्तजनोंको देख नहीं सकते॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.1.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 987) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/1/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)