॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.1.25
सर्गस्थित्यप्यया यत्र रजःसत्त्वतमोगुणैः।
लीलैवं द्विविधा तस्य वास्तवी व्यावहारिकी॥ २५
sargasthityapyayā yatra rajaḥsattvatamoguṇaiḥ|
līlaivaṃ dvividhā tasya vāstavī vyāvahārikī|| 25
अर्थ
प्रकृतिके साथ होनेवाली लीलामें ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके द्वारा सृष्टि, स्थिति और प्रलयकी प्रतीति होती है। इस प्रकार यह निश्चय होता है कि भगवान्की लीला दो प्रकारकी है—एक वास्तवी और दूसरी व्यावहारिकी॥ २५॥