प्रिय वज्रनाभ! यदि मैं उनके उपकारोंका बदला चुकाना चाहूँ तो किसी प्रकार नहीं चुका सकता। इसलिये मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुम सुखपूर्वक अपने राजकाजमें लगे रहो॥ १०॥
न पारयाम्यहं तात साधु कृत्वोपकारतः।
त्वामतः प्रार्थयाम्यंग सुखं राज्येऽनुयुज्यताम्॥ १०
प्रिय वज्रनाभ! यदि मैं उनके उपकारोंका बदला चुकाना चाहूँ तो किसी प्रकार नहीं चुका सकता। इसलिये मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुम सुखपूर्वक अपने राजकाजमें लगे रहो॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.1.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 984) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/1/10/