श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.82

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

श्रीमद्भागवतं पुराणतिलकं यद्वैष्णवानां धनं

यस्मिन् पारमहंस्यमेवममलं ज्ञानं परं गीयते।

यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं

तच्छृण्वन् प्रपठन् विचारणपरो भक्‍त्या विमुच्येन्‍नरः॥ ८२

śrīmadbhāgavataṃ purāṇatilakaṃ yadvaiṣṇavānāṃ dhanaṃ

yasmin pāramahaṃsyamevamamalaṃ jñānaṃ paraṃ gīyate|

yatra jñānavirāgabhaktisahitaṃ naiṣkarmyamāviṣkṛtaṃ

tacchṛṇvan prapaṭhan vicāraṇaparo bhaktyā vimucyennaraḥ|| 82

अर्थ

यह भागवत पुराणोंका तिलक और वैष्णवोंका धन है। इसमें परमहंसोंके प्राप्य विशुद्ध ज्ञानका ही वर्णन किया गया है; तथा ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके सहित निवृत्तिमार्गको प्रकाशित किया गया है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक इसके श्रवण, पठन और मननमें तत्पर रहता है, वह मुक्त हो जाता है॥ ८२॥✎ 1273

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1273 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीमद्भागवत-महापुराणकी → श्रीमद्भागवतमहापुराणकी

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