॥ श्रीहरिः ॥
प्रसादतुलसीमाला श्रोतृभ्यश्चाथ दीयताम्।
मृदङ्गतालललितं कर्तव्यं कीर्तनं ततः॥ ५७
prasādatulasīmālā śrotṛbhyaścātha dīyatām|
mṛdaṅgatālalalitaṃ kartavyaṃ kīrtanaṃ tataḥ|| 57
अर्थ
फिर वक्ता श्रोताओंको प्रसाद, तुलसी और प्रसादी मालाएँ दे तथा सब लोग मृदंग और झाँझकी मनोहर ध्वनिसे सुन्दर कीर्तन करें॥ ५७॥
प्रसादतुलसीमाला श्रोतृभ्यश्चाथ दीयताम्।
मृदङ्गतालललितं कर्तव्यं कीर्तनं ततः॥ ५७
फिर वक्ता श्रोताओंको प्रसाद, तुलसी और प्रसादी मालाएँ दे तथा सब लोग मृदंग और झाँझकी मनोहर ध्वनिसे सुन्दर कीर्तन करें॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 75) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/57/