॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.5.55
आर्द्रं शुष्कं लघु स्थूलं वाङ्मनः कर्मभिः कृतम्।
श्रवणं विदहेत्पापं पावकः समिधो यथा॥ ५५
ārdraṃ śuṣkaṃ laghu sthūlaṃ vāṅmanaḥ karmabhiḥ kṛtam|
śravaṇaṃ vidahetpāpaṃ pāvakaḥ samidho yathā|| 55
अर्थ
जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी—सब तरहकी लकड़ियोंको जला डालती है, उसी प्रकार यह सप्ताहश्रवण मन, वचन और कर्मद्वारा किये हुए नये-पुराने, छोटे-बड़े—सभी प्रकारके पापोंको भस्म कर देता है॥ ५५॥