श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.51

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

दिव्यरूपधरो जातस्तुलसीदाममण्डितः।

पीतवासा घनश्यामो मुकुटी कुण्डलान्वितः॥ ५१

divyarūpadharo jātastulasīdāmamaṇḍitaḥ|

pītavāsā ghanaśyāmo mukuṭī kuṇḍalānvitaḥ|| 51

अर्थ

इस प्रकार सात दिनोंमें सातों गाँठोंको फोड़कर धुन्धुकारी बारहों स्कन्धोंके सुननेसे पवित्र होकर प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया और दिव्यरूप धारण करके सबके सामने प्रकट हुआ। उसका मेघके समान श्याम शरीर पीताम्बर और तुलसीकी मालाओंसे सुशोभित था तथा सिरपर मनोहर मुकुट और कानोंमें कमनीय कुण्डल झिलमिला रहे थे॥ ५०-५१॥

यह अर्थ श्लोक 50–51 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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