श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.33

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

प्रेत उवाच

गयाश्राद्धशतेनापि मुक्तिर्मे न भविष्यति।

उपायमपरं कञ्चित्त्वं विचारय साम्प्रतम्॥ ३३

gayāśrāddhaśatenāpi muktirme na bhaviṣyati|

upāyamaparaṃ kañcittvaṃ vicāraya sāmpratam|| 33

अर्थ

प्रेतने कहा—मेरी मुक्ति सैकड़ों गया-श्राद्ध करनेसे भी नहीं हो सकती। अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो॥ ३३॥

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