श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.5.30

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अहो बन्धो कृपासिन्धो भ्रातर्मामाशु मोचय।

गोकर्णो वचनं श्रुत्वा तस्मै वाक्यमथाब्रवीत्॥ ३०

aho bandho kṛpāsindho bhrātarmāmāśu mocaya|

gokarṇo vacanaṃ śrutvā tasmai vākyamathābravīt|| 30

अर्थ

भाई! तुम दयाके समुद्र हो; अब किसी प्रकार जल्दी ही मुझे इस योनिसे छुड़ाओ।’ गोकर्णने धुन्धुकारीकी सारी बातें सुनीं और तब उससे बोले॥ ३०॥

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