क्व वित्तं तिष्ठति ब्रूहि हनिष्ये लत्तया न चेत्॥ १
pitaryuparate tena jananī tāḍitā bhṛśam|
kva vittaṃ tiṣṭhati brūhi haniṣye lattayā na cet|| 1
अर्थ
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! पिताके वन चले जानेपर एक दिन धुन्धुकारीने अपनी माताको बहुत पीटा और कहा—‘बता, धन कहाँ रखा है? नहीं तो अभी तेरी लुआठी (जलती लकड़ी)-से खबर लूँगा॥ १॥
पितर्युपरते तेन जननी ताडिता भृशम्।
क्व वित्तं तिष्ठति ब्रूहि हनिष्ये लत्तया न चेत्॥ १
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! पिताके वन चले जानेपर एक दिन धुन्धुकारीने अपनी माताको बहुत पीटा और कहा—‘बता, धन कहाँ रखा है? नहीं तो अभी तेरी लुआठी (जलती लकड़ी)-से खबर लूँगा॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.5.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 62) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/5/1/