श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.65

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

न ज्ञातं तद्रहस्यं तु केनापि विधियोगतः।

गोकर्णं तं सुतं दृष्ट्वा गोकर्णं नाम चाकरोत्॥ ६५

na jñātaṃ tadrahasyaṃ tu kenāpi vidhiyogataḥ|

gokarṇaṃ taṃ sutaṃ dṛṣṭvā gokarṇaṃ nāma cākarot|| 65

अर्थ

दैवयोगसे इस गुप्त रहस्यका किसीको भी पता न लगा। आत्मदेवने उस बालकके गौके-से कान देखकर उसका नाम ‘गोकर्ण’ रखा॥ ६५॥

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