दैवयोगसे इस गुप्त रहस्यका किसीको भी पता न लगा। आत्मदेवने उस बालकके गौके-से कान देखकर उसका नाम ‘गोकर्ण’ रखा॥ ६५॥
न ज्ञातं तद्रहस्यं तु केनापि विधियोगतः।
गोकर्णं तं सुतं दृष्ट्वा गोकर्णं नाम चाकरोत्॥ ६५
दैवयोगसे इस गुप्त रहस्यका किसीको भी पता न लगा। आत्मदेवने उस बालकके गौके-से कान देखकर उसका नाम ‘गोकर्ण’ रखा॥ ६५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.65 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 60) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/4/65/