॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.4.64
भाग्योदयोऽधुना जात आत्मदेवस्य पश्यत।
धेन्वा बालः प्रसूतस्तु देवरूपीति कौतुकम्॥ ६४
bhāgyodayo'dhunā jāta ātmadevasya paśyata|
dhenvā bālaḥ prasūtastu devarūpīti kautukam|| 64
अर्थ
तथा आपसमें कहने लगे, ‘देखो, भाई! अब आत्मदेवका कैसा भाग्य उदय हुआ है! कैसे आश्चर्यकी बात है कि गौके भी ऐसा दिव्यरूप बालक उत्पन्न हुआ है॥ ६४॥