॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.4.54
षाण्मासिको मृतो बाल इति लोको वदिष्यति।
तं बालं पोषयिष्यामि नित्यमागत्य ते गृहे॥ ५४
ṣāṇmāsiko mṛto bāla iti loko vadiṣyati|
taṃ bālaṃ poṣayiṣyāmi nityamāgatya te gṛhe|| 54
अर्थ
एक दिन उसकी बहिन अपने-आप ही उसके घर आयी; तब उसने अपनी बहिनको सारा वृत्तान्त सुनाकर कहा कि ‘मेरे मनमें इसकी बड़ी चिन्ता है॥ ५१॥ मैं इस दुःखके कारण दिनोंदिन दुबली हो रही हूँ। बहिन! मैं क्या करूँ?’ बहिनने कहा, ‘मेरे पेटमें बच्चा है, प्रसव होनेपर वह बालक मैं तुझे दे दूँगी॥ ५२॥ तबतक तू गर्भवतीके समान घरमें गुप्तरूपसे सुखसे रह। तू मेरे पतिको कुछ धन दे देगी तो वे तुझे अपना बालक दे देंगे॥ ५३॥ (हम ऐसी युक्ति करेंगी) कि जिसमें सब लोग यही कहें कि ‘इसका बालक छः महीनेका होकर मर गया’ और मैं नित्यप्रति तेरे घर आकर उस बालकका पालन-पोषण करती रहूँगी॥ ५४॥ तू इस समय इसकी जाँच करनेके लिये यह फल गौको खिला दे।’ ब्राह्मणीने स्त्रीस्वभाववश जो-जो उसकी बहिनने कहा था, वैसे ही सब किया॥ ५५॥ ✎ 1569