श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.51

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

एकदा भगिनी तस्यास्तद‍्गृहं स्वेच्छयाऽऽगता।

तदग्रे कथितं सर्वं चिन्तेयं महती हि मे॥ ५१

ekadā bhaginī tasyāstadgṛhaṃ svecchayā''gatā|

tadagre kathitaṃ sarvaṃ cinteyaṃ mahatī hi me|| 51

अर्थ

एक दिन उसकी बहिन अपने-आप ही उसके घर आयी; तब उसने अपनी बहिनको सारा वृत्तान्त सुनाकर कहा कि ‘मेरे मनमें इसकी बड़ी चिन्ता है॥ ५१॥ मैं इस दुःखके कारण दिनोंदिन दुबली हो रही हूँ। बहिन! मैं क्या करूँ?’ बहिनने कहा, ‘मेरे पेटमें बच्चा है, प्रसव होनेपर वह बालक मैं तुझे दे दूँगी॥ ५२॥ तबतक तू गर्भवतीके समान घरमें गुप्तरूपसे सुखसे रह। तू मेरे पतिको कुछ धन दे देगी तो वे तुझे अपना बालक दे देंगे॥ ५३॥ (हम ऐसी युक्ति करेंगी) कि जिसमें सब लोग यही कहें कि ‘इसका बालक छः महीनेका होकर मर गया’ और मैं नित्यप्रति तेरे घर आकर उस बालकका पालन-पोषण करती रहूँगी॥ ५४॥ तू इस समय इसकी जाँच करनेके लिये यह फल गौको खिला दे।’ ब्राह्मणीने स्त्रीस्वभाववश जो-जो उसकी बहिनने कहा था, वैसे ही सब किया॥ ५५॥ ✎ 1569

यह व्याख्या श्लोक PRE.4.51 से PRE.4.55 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1569 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गुप्त-रूपसे → गुप्तरूपसे

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