मनमें ऐसे ही तरह-तरहके कुतर्क उठनेसे उसने वह फल नहीं खाया और जब उसके पतिने पूछा—‘फल खा लिया?’ तब उसने कह दिया—‘हाँ, खा लिया’॥ ५०॥
एवं कुतर्कयोगेन तत्फलं नैव भक्षितम्।
पत्या पृष्टं फलं भुक्तं भुक्तं चेति तयेरितम्॥ ५०
मनमें ऐसे ही तरह-तरहके कुतर्क उठनेसे उसने वह फल नहीं खाया और जब उसके पतिने पूछा—‘फल खा लिया?’ तब उसने कह दिया—‘हाँ, खा लिया’॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 58) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/4/50/