॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.4.44
तरुणी कुटिला तस्य सख्यग्रे च रुरोद ह।
अहो चिन्ता ममोत्पन्ना फलं चाहं न भक्षये॥ ४४
taruṇī kuṭilā tasya sakhyagre ca ruroda ha|
aho cintā mamotpannā phalaṃ cāhaṃ na bhakṣaye|| 44
अर्थ
उसकी स्त्री तो कुटिल स्वभावकी थी ही, वह रो-रोकर अपनी एक सखीसे कहने लगी—‘सखी! मुझे तो बड़ी चिन्ता हो गयी, मैं तो यह फल नहीं खाऊँगी ॥ ४४॥