॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.4.3
त्रिभङ्गललितश्चारुकौस्तुभेन विराजितः।
कोटिमन्मथलावण्यो हरिचन्दनचर्चितः॥ ३
tribhaṅgalalitaścārukaustubhena virājitaḥ|
koṭimanmathalāvaṇyo haricandanacarcitaḥ|| 3
अर्थ
वे त्रिभंगललित भावसे खड़े हुए चित्तको चुराये लेते थे। वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि दमक रही थी, सारा श्रीअंग हरिचन्दनसे चर्चित था। उस रूपकी शोभा क्या कहें, उसने तो मानो करोड़ों कामदेवोंकी रूपमाधुरी छीन ली थी॥ ३॥