श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.2

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

वनमाली घनश्यामः पीतवासा मनोहरः।

काञ्चीकलापरुचिरो लसन्मुकुटकुण्डलः॥ २

vanamālī ghanaśyāmaḥ pītavāsā manoharaḥ|

kāñcīkalāparuciro lasanmukuṭakuṇḍalaḥ|| 2

अर्थ

उनके गलेमें वनमाला शोभा पा रही थी, श्रीअंग सजल जलधरके समान श्यामवर्ण था, उसपर मनोहर पीताम्बर सुशोभित था, कटिप्रदेश करधनीकी लड़ियोंसे सुसज्जित था, सिरपर मुकुटकी लटक और कानोंमें कुण्डलोंकी झलक देखते ही बनती थी॥ २॥

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