श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.71

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

भक्तेषु गोविन्दस्वरूपकर्त्री प्रेमैकधर्त्री भवरोगहन्त्री।

सा त्वं च तिष्ठस्व सुधैर्यसंश्रया निरन्तरं वैष्णवमानसानि॥ ७१

bhakteṣu govindasvarūpakartrī premaikadhartrī bhavarogahantrī|

sā tvaṃ ca tiṣṭhasva sudhairyasaṃśrayā nirantaraṃ vaiṣṇavamānasāni|| 71

अर्थ

‘तुम भक्तोंको भगवान्‌का स्वरूप प्रदान करनेवाली, अनन्यप्रेमका सम्पादन करनेवाली और संसाररोगको निर्मूल करनेवाली हो; अतः तुम धैर्य धारण करके नित्य-निरन्तर विष्णुभक्तोंके हृदयोंमें ही निवास करो॥ ७१॥✎ 1568

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1568 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

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