जिसने इस शुकशास्त्रके थोड़े-से भी वचन नहीं सुने, वह पापात्मा तो जीता हुआ ही मुर्देके समान है। ‘पृथ्वीके भारस्वरूप उस पशुतुल्य मनुष्यको धिक्कार है’—यों स्वर्गलोकमें देवताओंमें प्रधान इन्द्रादि कहा करते हैं॥ ४३॥
जीवच्छवोनिगदितः स तु पापकर्मा
येन श्रुतं शुककथावचनं न किञ्चित्।
धिक् तं नरं पशुसमं भुवि भाररूप-
मेवं वदन्ति दिवि देवसमाजमुख्याः॥ ४३
जिसने इस शुकशास्त्रके थोड़े-से भी वचन नहीं सुने, वह पापात्मा तो जीता हुआ ही मुर्देके समान है। ‘पृथ्वीके भारस्वरूप उस पशुतुल्य मनुष्यको धिक्कार है’—यों स्वर्गलोकमें देवताओंमें प्रधान इन्द्रादि कहा करते हैं॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.3.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 50) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/3/43/