॥ श्रीहरिः ॥
मुखं संयोज्य कर्णान्ते शब्दमुच्चैः समुच्चरन्।
ज्ञान प्रबुध्यतां शीघ्रं रे वैराग्य प्रबुध्यताम्॥ २६
mukhaṃ saṃyojya karṇānte śabdamuccaiḥ samuccaran|
jñāna prabudhyatāṃ śīghraṃ re vairāgya prabudhyatām|| 26
अर्थ
फिर उनके कानके पास मुँह लगाकर जोरसे कहा, ‘ओ ज्ञान! जल्दी जग पड़ो; ओ वैराग्य! जल्दी जग पड़ो।’॥ २६॥✎ 1966
मुखं संयोज्य कर्णान्ते शब्दमुच्चैः समुच्चरन्।
ज्ञान प्रबुध्यतां शीघ्रं रे वैराग्य प्रबुध्यताम्॥ २६
फिर उनके कानके पास मुँह लगाकर जोरसे कहा, ‘ओ ज्ञान! जल्दी जग पड़ो; ओ वैराग्य! जल्दी जग पड़ो।’॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 42) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/2/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1966 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सुनाई → सुनायी