श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.80

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

जयति जगति मायां यस्य कायाधवस्ते

वचनरचनमेकं केवलं चाकलय्य।

ध्रुवपदमपि यातो यत्कृपातो ध्रुवोऽयं

सकलकुशलपात्रं ब्रह्मपुत्रं नतास्मि॥ ८०

jayati jagati māyāṃ yasya kāyādhavaste

vacanaracanamekaṃ kevalaṃ cākalayya|

dhruvapadamapi yāto yatkṛpāto dhruvo'yaṃ

sakalakuśalapātraṃ brahmaputraṃ natāsmi|| 80

अर्थ

आपका केवल एक बारका उपदेश धारण करके कयाधूकुमार प्रह्लादने मायापर विजय प्राप्त कर ली थी। ध्रुवने भी आपकी कृपासे ही ध्रुवपद प्राप्त किया था। आप सर्वमंगलमय और साक्षात् श्रीब्रह्माजीके पुत्र हैं, मैं आपको नमस्कार करती हूँ॥ ८०॥

इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये भक्तिनारदसमागमो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥

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