श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.8

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

चिन्तामणिर्लोकसुखं सुरद्रुः स्वर्गसम्पदम्।

प्रयच्छति गुरुः प्रीतो वैकुण्ठं योगिदुर्लभम्॥ ८

cintāmaṇirlokasukhaṃ suradruḥ svargasampadam|

prayacchati guruḥ prīto vaikuṇṭhaṃ yogidurlabham|| 8

अर्थ

चिन्तामणि केवल लौकिक सुख दे सकती है और कल्पवृक्ष अधिक-से-अधिक स्वर्गीय सम्पत्ति दे सकता है; परन्तु गुरुदेव प्रसन्‍न होकर भगवान्‌का योगिदुर्लभ नित्य वैकुण्ठधाम दे देते हैं॥ ८॥

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