श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.62

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अत्रेमौ ग्राहकाभावान्‍न जरामपि मुञ्चतः।

किञ्चिदात्मसुखेनेह प्रसुप्तिर्मन्यतेऽनयोः॥ ६२

atremau grāhakābhāvānna jarāmapi muñcataḥ|

kiñcidātmasukheneha prasuptirmanyate'nayoḥ|| 62

अर्थ

परंतु तुम्हारे इन दोनों पुत्रोंका यहाँ कोई ग्राहक नहीं है, इसलिये इनका बुढ़ापा नहीं छूट रहा है। यहाँ इनको कुछ आत्मसुख (भगवत्स्पर्शजनित आनन्द)-की प्राप्ति होनेके कारण ये सोते-से जान पड़ते हैं॥ ६२॥

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