नारदजीने कहा—साध्वि! मैं अपने हृदयमें ज्ञानदृष्टिसे तुम्हारे सम्पूर्ण दुःखका कारण देखता हूँ, तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये। श्रीहरि तुम्हारा कल्याण करेंगे॥ ५५॥
ज्ञानेनात्मनि पश्यामि सर्वमेतत्तवानघे।
न विषादस्त्वया कार्यो हरिः शं ते करिष्यति॥ ५५
नारदजीने कहा—साध्वि! मैं अपने हृदयमें ज्ञानदृष्टिसे तुम्हारे सम्पूर्ण दुःखका कारण देखता हूँ, तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये। श्रीहरि तुम्हारा कल्याण करेंगे॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 38) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/55/