श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.46

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

गङ्गाद्याः सरितश्चेमा मत्सेवार्थं समागताः।

तथापि न च मे श्रेयः सेवितायाः सुरैरपि॥ ४६

gaṅgādyāḥ saritaścemā matsevārthaṃ samāgatāḥ|

tathāpi na ca me śreyaḥ sevitāyāḥ surairapi|| 46

अर्थ

ये देवियाँ गंगाजी आदि नदियाँ हैं। ये सब मेरी सेवा करनेके लिये ही आयी हैं। इस प्रकार साक्षात् देवियोंके द्वारा सेवित होनेपर भी मुझे सुख-शान्ति नहीं है॥ ४६॥

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