॥ श्रीहरिः ॥
भो भोः साधो क्षणं तिष्ठ मच्चिन्तामपि नाशय।
दर्शनं तव लोकस्य सर्वथाघहरं परम्॥ ४२
bho bhoḥ sādho kṣaṇaṃ tiṣṭha maccintāmapi nāśaya|
darśanaṃ tava lokasya sarvathāghaharaṃ param|| 42
अर्थ
युवतीने कहा—अजी महात्माजी! क्षणभर ठहर जाइये और मेरी चिन्ताको भी नष्ट कर दीजिये। आपका दर्शन तो संसारके सभी पापोंको सर्वथा नष्ट कर देनेवाला है॥ ४२॥
भो भोः साधो क्षणं तिष्ठ मच्चिन्तामपि नाशय।
दर्शनं तव लोकस्य सर्वथाघहरं परम्॥ ४२
युवतीने कहा—अजी महात्माजी! क्षणभर ठहर जाइये और मेरी चिन्ताको भी नष्ट कर दीजिये। आपका दर्शन तो संसारके सभी पापोंको सर्वथा नष्ट कर देनेवाला है॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 37) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/42/